यह बच्चों की मृत्यु नहीं, हत्या है

0
126
gorakhpurगोरखपुर के मेडिकल काॅलेज में 30 मासूम बच्चों की मृत्यु हुई है या हत्या हुई है, यह कौन तय करेगा ? यह मृत्यु नहीं, हत्या है। और यह हत्याकांड इसलिए शर्मनाक है कि यह गोरखपुर में हुआ है, जो मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का अपना निर्वाचन-क्षेत्र है। योगी अभी तीन दिन पहले इस अस्पताल में एक नए सघन चिकित्सा-कक्ष का उद्घाटन करने गए थे। इतना ही नहीं, इस अस्पताल को उप्र के पूर्वी क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ अस्पताल माना जाता है। योगी ने सांसद के तौर पर इसी अस्पताल में जापानी बुखार के इलाज पर जबर्दस्त हंगामा खड़ा किया था। गोरखपुर के इस अस्पताल में घटी इस दर्दनाक घटना ने योगी सरकार का मुंह काला कर दिया है, हालांकि उसमें योगी का कोई हाथ नहीं है। ऐसी मर्मांतक घटना गोरखपुर में हो जाए, इसका मतलब क्या है ? साफ है। इस अस्पताल के अधिकारियों को सरकार का डर जरा भी नहीं है। उन्हें योगी की इज्जत की परवाह ज़रा भी नहीं है। जिस सरकार से अपराधी डरते न हों और जिसकी इज्जत उसके घर में ही नहीं हो, वह सरकार भी क्या सरकार है ? इस घटना ने योगी की सरकार को इतना जबर्दस्त झटका दे दिया है कि वह अपने पूरे कार्यकाल में इससे उबर नहीं पाएगी। योगी का जो भी हो, इस घटना ने देश के करोड़ों लोगों को हिलाकर रख दिया है। यह कल और आज की सबसे बड़ी खबर बनी है। जाहिर है कि सरकारी अस्पताल में किनके बच्चे होंगे ? नेताओं, अफसरों और मालदार लोगों के बच्चे तो प्रायः गैर-सरकारी अस्पतालों में ही जाते हैं। ये बच्चे उन लोगों के हैं, जिनकी आय कम हैं, जो मध्यमवर्ग के हैं, जो गरीब हैं और जो बेजुबान हैं। उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार अफसर क्या सफाई पेश कर रहे हैं ? वे कह रहे हैं कि ये बच्चे आॅक्सीजन की सप्लाय बंद होने से नहीं, गंभीर बीमारी के कारण मरे हैं। जबकि वे यह मानते हैं कि आॅक्सीजन सप्लाय करनेवाली कंपनी ने सप्लाय इसलिए बंद कर दी थी कि अस्पताल ने उसके बकाया 68 लाख रु. नहीं दिए थे। उस कंपनी ने कई चेतावनियों के बाद आक्सीजन बंद की थी। आॅक्सीजन का बंद होना जिला अधिकारी भी स्वीकार कर रहे हैं और अस्पताल के अधिकारी भी मान रहे हैं कि आॅक्सीजन के बंद होते ही अफरा-तफरी मच गई थी। कई डाॅक्टर और बच्चों के माता-पिता टैक्सियों और निजी कारों में आॅक्सीजन की टंकियां ढो-ढोकर ला रहे थे। अगर इन माता-पिताओं में कुछ मंत्री होते, कुछ सांसद-विधायक होते, कुछ कलेक्टर-कमिश्नर होते, कुछ वकील और जज होते तो शायद उन बच्चों की इतनी निर्मम हत्या नहीं होती। आॅक्सीजन का भुगतान कभी का हो जाता। 68 लाख रु. के लिए 30 बच्चों की बलि नहीं चढ़ती। इसीलिए मैं कहता हूं कि यदि आप सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारना चाहते हों तो सांसदों, विधायकों, पार्षदों और समस्त सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य कीजिए कि वे खुद का और अपने परिजन का इलाज़ सरकारी अस्पतालों में ही करवाएं !
 डॉ. वेदप्रताप वैदिक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)